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Showing posts from May, 2026

शिकारगाह: राजा, सैनिक और शिकारी

भारतीय इतिहास में शिकारगाह — अर्थात् राजकीय आखेट-भूमि — केवल एक खेल का मैदान नहीं थी। यह राजनीति, युद्धकला, पराक्रम-प्रदर्शन और सत्ता के संकेतों की एक जटिल भूमि थी। राजा के शिकारी और उसके सैनिक प्रायः एक ही व्यक्ति होते थे या एक ही परंपरा के वाहक। शिकार करना केवल पशु मारना नहीं, बल्कि योद्धा-पहचान को जीवित रखने का साधन था। शिकारगाह — अर्थ और स्वरूप शिकारगाह फ़ारसी शब्द है — 'शिकार' (आखेट) + 'गाह' (स्थान)। यह वह विशेष भूभाग था जिसे राजकीय शिकार के लिए आरक्षित और संरक्षित रखा जाता था। मुगलकाल में इन्हें शिकारगाह-ए-मुकर्रर (स्थायी एवं पसंदीदा शिकार-भूमि) कहा जाता था। शिकारगाह की प्रमुख विशेषताएँ पारिस्थितिक संरचना शिकारगाह एक सुनियोजित, परिवर्तित पारिस्थितिक परिदृश्य था — जंगल की सीमा पर, कृषि-भूमि और अदम्य वन के बीच एक संक्रमण-क्षेत्र। यहाँ शिकार के लिए वन्यजीवों को संरक्षित किया जाता था। राजनीतिक प्रतीक शिकारगाह राजा की संप्रभुता का चिह्न था। यदि कोई राजा अपनी शिकारगाह खो देता तो यह उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा के ह्रास का संकेत माना जाता था। सैन्य प्रशिक्षण-भूमि शिकारगाह सैन...

बहेलिया समुदाय: वन-रक्षक और शिकारी

1. प्रस्तावना भारत के वन-प्रांतरों में सदियों से एक विशेष समुदाय निवास करता आया है जिसे बहेलिया कहा जाता है। यह समुदाय परंपरागत रूप से शिकार, पक्षी-पकड़ और वन्य जीवों के साथ सहजीवन की अद्भुत परंपरा का वाहक रहा है। ब्रिटिश शासनकाल (1858–1947) में लिखे गए अनेक शिकार-ग्रंथों में बहेलिया समुदाय का उल्लेख 'शिकारी' (Shikari) के रूप में किया गया है — जो न केवल यूरोपीय अधिकारियों के शिकार-अभियानों के मार्गदर्शक थे, बल्कि ग्रामीण जनता को बाघ, तेंदुआ जैसे खूंखार जानवरों से बचाने वाले रक्षक भी थे। ऐतिहासिक शिकार-पुस्तकों के अनुसार, 'Shikari' शब्द भारत के उन पेशेवर शिकारियों के लिए प्रयुक्त होता था जिन्हें उनके स्थानीय वन-ज्ञान और कौशल के कारण ब्रिटिश अधिकारियों और महाराजाओं द्वारा नियुक्त किया जाता था। J. Moray Brown द्वारा लिखित 'Shikar Sketches: With Notes on Indian Field-Sports' (1887, प्रकाशक: Hurst and Blackett, लंदन) में शिकारी समुदाय की केंद्रीय भूमिका का विस्तृत चित्रण मिलता है। 2. बहेलिया: परंपरागत वन-ज्ञाता और शिकारी डेनियल जॉनसन की प्रसिद्ध पुस्तक Sketches of Fi...

बहेलिया वंस राज्य: राजा हरेबा और राजा निगोरिया का शासनकाल

  राजा हरेबा और राजा निगोरिया का शासनकाल प्रस्तावना बिहार के जमुई जिले के गिद्धौर क्षेत्र में चन्देल वंश की स्थापना से पूर्व वहाँ बहेलिया-वंशीय दुसाध जाति के राजाओं का शासन था। ये किरात-वंशीय शासक थे, जो प्राचीन काल से इस क्षेत्र के अधिपति थे। केशवचन्द्र मिश्र अपनी पुस्तक चन्देल और उनका राजत्व-काल में स्पष्ट उल्लेख करते हैं कि "चन्देलों के पहले यहाँ के शासक किरात-वंशीय राजा थे और वे बहेलिया-वंशीय दुसाध थे।" इनके शासनकाल का इतिहास न केवल राजनीतिक दृष्टि से, अपितु सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। राजा हरेबा (हरेवा) पालवंशीय राजा इन्द्रद्युम्न सन् ११९८ ई॰ में मुस्लिम आक्रमणकारियों — बख्तियार खिलजी अथवा शहाबुद्दीन गोरी — से पराजित होकर बिहार से पलायन कर गए। उन्होंने अपनी राजधानी इन्दपै और तदुपरान्त जयनगर (लखीसराय) छोड़कर उड़ीसा की ओर प्रस्थान किया। इनके जाने के पश्चात् उनके सेनापति हरेबा ने गिद्धौर के सिंहासन पर अधिकार किया। ये दुसाधवंशी थे। डॉ॰ श्यामनन्दन प्रसाद के अनुसार हरेबा के वंशजों ने ११९८ ई॰ से १२६६ ई॰ तक, कुल ६८ वर्षों तक शासन किया। स्थानीय जन...