बहेलिया समुदाय: वन-रक्षक और शिकारी

1. प्रस्तावना

भारत के वन-प्रांतरों में सदियों से एक विशेष समुदाय निवास करता आया है जिसे बहेलिया कहा जाता है। यह समुदाय परंपरागत रूप से शिकार, पक्षी-पकड़ और वन्य जीवों के साथ सहजीवन की अद्भुत परंपरा का वाहक रहा है। ब्रिटिश शासनकाल (1858–1947) में लिखे गए अनेक शिकार-ग्रंथों में बहेलिया समुदाय का उल्लेख 'शिकारी' (Shikari) के रूप में किया गया है — जो न केवल यूरोपीय अधिकारियों के शिकार-अभियानों के मार्गदर्शक थे, बल्कि ग्रामीण जनता को बाघ, तेंदुआ जैसे खूंखार जानवरों से बचाने वाले रक्षक भी थे।

ऐतिहासिक शिकार-पुस्तकों के अनुसार, 'Shikari' शब्द भारत के उन पेशेवर शिकारियों के लिए प्रयुक्त होता था जिन्हें उनके स्थानीय वन-ज्ञान और कौशल के कारण ब्रिटिश अधिकारियों और महाराजाओं द्वारा नियुक्त किया जाता था। J. Moray Brown द्वारा लिखित 'Shikar Sketches: With Notes on Indian Field-Sports' (1887, प्रकाशक: Hurst and Blackett, लंदन) में शिकारी समुदाय की केंद्रीय भूमिका का विस्तृत चित्रण मिलता है।

2. बहेलिया: परंपरागत वन-ज्ञाता और शिकारी

डेनियल जॉनसन की प्रसिद्ध पुस्तक Sketches of Field Sports as Followed by the Natives of India (1822, प्रकाशक: Longman, Hurst, Rees, Orme and Browne, लंदन) में लेखक ने भारतीय शिकारियों के एक विशेष वर्ग — 'शेकारी' (Shecarries) — का विस्तृत विवरण दिया है। जॉनसन वर्णन करते हैं कि शेकारी पूर्णतः पशु-पकड़ने और शिकार से जीविका अर्जित करने वाले पारंपरिक शिकारी थे — इनमें कुछ पक्षी और खरगोश पकड़ते थे, कुछ विभिन्न जंगली जानवरों को पकड़ते थे, और एक वर्ग बाघों को मारकर जीवनयापन करता था।

इसी पुस्तक के अध्याय II में 'हाँका' (Hunquah) अर्थात् जंगली जानवरों को जालों में खदेड़ने की वार्षिक प्रक्रिया का वर्णन है — एक ऐसी परंपरा जो रामपुर, रोगोनौतपोर, बिस्सुनपोर आदि क्षेत्रों के छोटे राजाओं और जमींदारों के क्षेत्रों में प्रचलित थी। इन अभियानों में स्थानीय शिकारी समुदाय की केंद्रीय भूमिका होती थी।

3. ग्रामीणों के रक्षक: बाघ और तेंदुए से संरक्षण

जॉनसन की पुस्तक के पृष्ठ 84 पर 'बाघ' (Tigers) अध्याय में वर्णन है कि जब किसी गांव में बाघ का आतंक होता था, तो ग्रामीण 'शेकारी' को बुलाते थे — क्योंकि ये जानते थे कि बाघ को कैसे ढूंढना और मारना है। शेकारी बहेलिये रात को 'मिचाउन' (मचान) पर अकेले बैठकर बाघ का इंतजार करते थे। वे मैचलॉक बंदूक, तलवार और भाला लेकर जाते थे।

जेम्स फोर्सिथ की पुस्तक The Highlands of Central India: Notes on their Forests and Wild Tribes, Natural History, and Sports (1889, प्रकाशक: Chapman and Hall, लंदन) में भी यही वर्णन है। पृष्ठ 271 पर फोर्सिथ लिखते हैं कि प्रत्येक गांव में एक ऐसा व्यक्ति होता था जिसका पेशा ही 'शिकारी' था — जो सदा सतर्क रहता था और जैसे ही किसी बैल के मारे जाने की खबर मिलती, वह उस स्थान पर पहुंचकर पेड़ पर पत्तों का मचान बनाकर रात को बाघ के लौटने का इंतजार करता था।

रस्किन बॉन्ड द्वारा संपादित The Rupa Book of Shikar Stories (2004, प्रकाशक: Rupa Publications, नई दिल्ली) में भी इस तथ्य की पुष्टि होती है कि बाघों और आदमखोर जानवरों से गांव तथा उनके पशुधन की रक्षा करना ही शिकार का सबसे बड़ा औचित्य था। इस पुस्तक में संकलित विभिन्न लेखकों के वृत्तांत — जैसे C.H. Donald, C.A. Kincaid, F.W. Champion और 'Nimrod' — इस बात के साक्षी हैं कि स्थानीय शिकारी समुदाय के बिना न कोई हाँका हो सकता था, न कोई मचान सज सकता था।

स्वीडिश लेखिका Astrid Bergman Sucksdorff की पुस्तक Tiger in Sight (1965/1970, प्रकाशक: Delacorte Press, न्यूयॉर्क) में भी मध्य भारत के जंगलों में स्थानीय वनवासियों की भूमिका का मार्मिक वर्णन है।  ग्रामीण स्वयं मचान बनाते थे और रात को बाघ के लौटने का इंतजार करते थे। पुस्तक में एक मार्मिक प्रसंग है जहाँ एक वृद्ध व्यक्ति की दोनों भैंसें बाघ मार देता है और वह रोते हुए कहता है — 'अब मेरे पास कुछ नहीं बचा।' यही त्रासदी इन शिकारी-रक्षकों की अनिवार्यता को सिद्ध करती थी।

4. यूरोपीय शिकारियों के मार्गदर्शक और सलाहकार

J. Moray Brown की पुस्तक Shikar Sketches: With Notes on Indian Field-Sports (1887) में वर्णित है कि नागपुर के 'Nagpore Hunt' क्लब में — जिसमें Her Majesty's 79th Highlanders के सदस्य शामिल थे — शिकारी (Shikaris) और बीटर (Beaters) क्लब की ओर से सदस्यों के लिए उपलब्ध कराए जाते थे। ये शिकारी हाँके के दौरान सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। पुस्तक में एक बालक का प्रेरणादायी उल्लेख है जिसे तेंदुए ने घायल किया, किंतु उसने हिम्मत नहीं हारी और कहा — 'मुझे एक दिन शिकारी बनना है।'

W.S. Burke द्वारा संकलित The Indian Field Shikar Book (चतुर्थ संस्करण, 1908, प्रकाशक: 'The Indian Field' Office, कलकत्ता) में भी स्पष्ट किया गया है कि भारत आने वाले यूरोपीय खिलाड़ी न तो देश की भाषा जानते थे, न रीति-रिवाज। अतः स्थानीय शिकारी उनके लिए दुभाषिए, वन-मार्गदर्शक और रणनीतिकार — तीनों की भूमिका एक साथ निभाते थे। बीटरों को उनकी मजदूरी सीधे और व्यक्तिगत रूप से देने की सलाह दी जाती थी।

फोर्सिथ ने पृष्ठ 278-279 पर स्पष्ट लिखा है कि गांव का शिकारी ही उस इलाके के बाघ की आदतों, उसके ठिकानों और ताजे पगमार्क को जानता है। यूरोपीय खिलाड़ी को शिकार से पहले ऐसे किसी व्यक्ति की सहायता अनिवार्य थी। इसी प्रकार 'बनवारी सिंह' नामक शिकारी का वर्णन है जो जिला दंडाधिकारी के साथ कार्यरत होते हुए भी एक कुशल पेशेवर शिकारी था।

सर जॉन हेवेट की पुस्तक Jungle Trails in Northern India: Reminiscences of Hunting in India (प्रकाशक: Methuen and Company Limited, लंदन) में उत्तर भारत के तराई क्षेत्र में 'थारू शिकारी' का उल्लेख है। Kalhu नामक थारू शिकारी के बिना तराई में शिकार-दल पूरी तरह असहाय था — यह इन पारंपरिक शिकारी समुदायों की अपरिहार्यता का स्पष्ट प्रमाण है।

5. बहेलिया समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका

बहेलिया समुदाय मूलतः उत्तर भारत — विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड के जंगली क्षेत्रों में पाया जाता है। ये वन-विशेषज्ञ परंपरागत रूप से निम्नलिखित कार्यों में दक्ष थे:

• जाल, फंदे और परंपरागत हथियारों से शिकार करना।

• बाघ-तेंदुए जैसे खतरनाक पशुओं से गाँव और उनके पशुधन की रक्षा करना।

• पशु-पगमार्क पढ़ने और वन-संकेत समझने में असाधारण निपुणता।

• हाँका (Hanka) अभियानों का संचालन — जिसमें जंगली जानवरों को जालों की ओर हाँका जाता था।

• जंगली पक्षियों की आवाज की नकल करके शिकार करना।

• यूरोपीय शिकारियों और स्थानीय राजाओं के शिकार-अभियानों में मार्गदर्शक और सलाहकार की भूमिका निभाना।

• मचान निर्माण और रात्रि-शिकार की विशेष कुशलता।


लेखक: आशुतोष कुमार 


6. संदर्भ ग्रंथ (References)

• Johnson, Daniel. Sketches of Field Sports as Followed by the Natives of India. London: Longman, Hurst, Rees, Orme and Browne, 1822.

• Forsyth, J. (James). The Highlands of Central India: Notes on their Forests and Wild Tribes, Natural History, and Sports. London: Chapman and Hall, 1889.

• Hewett, Sir John. Jungle Trails in Northern India: Reminiscences of Hunting in India. London: Methuen and Company Limited.

• Brown, J. Moray. Shikar Sketches: With Notes on Indian Field-Sports. London: Hurst and Blackett, Publishers, 1887.

• Burke, W.S. (Compiler). The Indian Field Shikar Book. Fourth Edition. Calcutta: 'The Indian Field' Office, 1908.

• Bond, Ruskin (Ed.). The Rupa Book of Shikar Stories. New Delhi: Rupa Publications India Pvt. Ltd., 2004.

• Sucksdorff, Astrid Bergman. Tiger in Sight [Tiger i sikte]. Translated by Joan Bulman. New York: Delacorte Press / A Seymour Lawrence Book, 1970.

— अशुतोष कुमार —

 इतिहास एवं जनजाति अध्ययन | बहेलिया समुदाय शोध


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